01. Discuss the ‘corrupt practices’ for the purpose of the Representation of the People Act, 1951. Analyze whether the increase in the assets of the legislators and/or their associates, disproportionate to their known sources of income, would constitute ‘undue influence’ and consequently a corrupt practice. (Answer in 150 words) – 10 marks
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 123 के तहत 'भ्रष्ट आचरण' को परिभाषित किया गया है, जिसमें रिश्वतखोरी, अनुचित प्रभाव और धर्म या जाति के आधार पर शत्रुता को बढ़ावा देना शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में यह व्यवस्था दी है कि सदन में वोट या भाषण के लिए रिश्वत लेने वाले विधायकों को अभियोजन से छूट नहीं मिलेगी, जिससे भ्रष्टाचार विरोधी मानक मज़बूत हुए हैं।
चुनाव के बाद किसी विधायक की आय से अधिक संपत्ति में वृद्धि को RPA के तहत स्पष्ट रूप से भ्रष्ट आचरण के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है। हालांकि, यह भ्रष्टाचार का एक संकेतक है, जिस पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जाता है। इस तरह के अवैध धन का उपयोग अगले चुनावों में 'अनुचित प्रभाव' डालने के लिए किया जा सकता है, जो धारा 123(2) के तहत एक भ्रष्ट आचरण है। यह मतदाताओं के स्वतंत्र चुनावी अधिकारों के प्रयोग में हस्तक्षेप करता है। अतः, संपत्ति का संचय अन्य कानूनों के तहत दंडनीय है, लेकिन चुनावी लाभ के लिए इसका उपयोग RPA के तहत एक भ्रष्ट आचरण होगा।
02. Comment on the need of administrative tribunals as compared to the court system. Assess the impact of the recent tribunal reforms through rationalization of tribunals made in 2021. (Answer in 150 words) – 10
प्रशासनिक अधिकरण, अनुच्छेद 323A और 323B के तहत, अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं जिन्हें सेवा मामलों और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में त्वरित, सस्ता और विशेषज्ञ न्याय प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है, ताकि उच्च न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ कम हो सके। ये सिविल प्रक्रिया संहिता की कठोर प्रक्रियाओं के बजाय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होते हैं, जिससे त्वरित और लचीला न्यायनिर्णयन संभव होता है।
अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 का उद्देश्य कई अपीलीय निकायों को समाप्त करके और उनके कार्यों को उच्च न्यायालयों को हस्तांतरित करके युक्तिसंगत बनाना था, जिसका कारण खराब न्यायनिर्णयन और देरी बताया गया। हालाँकि, इस सुधार की आलोचना की गई है क्योंकि यह उच्च न्यायालयों पर काम का बोझ बढ़ाता है, जो अधिकरणों की स्थापना के मूल उद्देश्य के विपरीत है। इसके अलावा, इस अधिनियम में सदस्यों के कार्यकाल और चयन से संबंधित उन प्रावधानों को फिर से शामिल किया गया है, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने पहले न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला बताकर रद्द कर दिया था। इस प्रकार, ये सुधार विवादास्पद रहे हैं, जो अधिकरण प्रणाली के लाभों को कमजोर करते हैं।
03. Compare and contrast the President’s power to pardon in India and in the USA. Are there any limits to it in both the countries? What are ‘preemptive pardons’? (Answer in 150 words) – 10
भारत में, राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 के तहत क्षमादान शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाता है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्ति संघीय अपराधों के लिए एक व्यक्तिगत, विवेकाधीन अधिकार है। भारतीय राष्ट्रपति की शक्ति का दायरा राज्यपाल से व्यापक है, जिसमें मृत्युदंड और कोर्ट-मार्शल के मामले शामिल हैं। इसके विपरीत, अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्ति लगभग पूर्ण है लेकिन संघीय अपराधों तक ही सीमित है और महाभियोग के मामलों पर लागू नहीं होती।
भारत में सीमाएं मंत्रिपरिषद की सलाह और न्यायिक समीक्षा हैं (मनमानी या दुर्भावना के आधार पर)। अमेरिका में, यह शक्ति केवल महाभियोग और राज्य के अपराधों के मामलों तक सीमित है।
'प्री-एम्पटिव पार्डन' (पूर्व-क्षमा), जो अमेरिकी प्रणाली की एक विशेषता है, किसी व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने या आरोपित होने से पहले दी जाने वाली क्षमा है। यह संघीय अपराधों पर राष्ट्रपति के व्यापक संवैधानिक अधिकार से उत्पन्न होती है।
04. Discuss the nature of Jammu and Kashmir Legislative Assembly after the Jammu and Kashmir Reorganization Act, 2019. Briefly describe the powers and functions of the Assembly of the Union Territory of Jammu and Kashmir. (Answer in 150 words) – 10
जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद, पूर्व राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी की तरह, एक विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश है, जिसका कार्यकाल पांच साल का है। परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से विधानसभा की निर्वाचित सीटों की संख्या 107 से बढ़ाकर 114 कर दी गई, जिसमें 90 सीटों पर चुनाव होंगे (24 सीटें पीओके के लिए आरक्षित हैं)। उप-राज्यपाल (एल-जी) को पांच सदस्यों को नामित करने का अधिकार है: कश्मीरी प्रवासी समुदाय से दो (जिनमें एक महिला होगी) और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से एक विस्थापित व्यक्ति।
विधानसभा राज्य और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकती है, लेकिन 'लोक व्यवस्था' और 'पुलिस' को इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे जाने के कारण इसकी शक्तियां सीमित हैं। ये विषय और अखिल भारतीय सेवाओं पर नियंत्रण केंद्र के प्रतिनिधि, उप-राज्यपाल में निहित हैं। केंद्र सरकार ने विधानसभा चुनाव कराने के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया है।
05. “The Attorney General of India plays a crucial role in guiding the legal framework of the Union Government and ensuring sound governance through legal counsel.” Discuss his responsibilities, rights and limitations in this regard. (Answer in 150 words) – 10
भारत के महान्यायवादी (AG), अनुच्छेद 76 के तहत, संघ के सर्वोच्च विधि अधिकारी और संघ कार्यकारिणी का एक महत्वपूर्ण अंग हैं।
उत्तरदायित्व: इनके प्रमुख उत्तरदायित्वों में राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कानूनी मामलों पर सरकार को सलाह देना और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में सरकार का प्रतिनिधित्व करना शामिल है। महान्यायवादी का कर्तव्य केवल सरकार के लिए मामले जीतना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जनता के साथ न्याय हो।
अधिकार: इनके अधिकारों में संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग लेने का विशेषाधिकार (मतदान के अधिकार के बिना) और भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार शामिल है। उन्हें संसद सदस्य को उपलब्ध सभी उन्मुक्तियाँ भी प्राप्त हैं।
सीमाएँ: वे राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जो उनकी राजनीतिक जवाबदेही को दर्शाता है। वे निजी प्रैक्टिस कर सकते हैं, लेकिन भारत सरकार के विरुद्ध कोई सलाह या मुकदमा नहीं लड़ सकते, जिससे हितों का टकराव न हो।
06. Women’s social capital complements in advancing empowerment and gender equity. Explain. (Answer in 150 words) – 10
महिलाओं की सामाजिक पूंजी, जो स्वयं-सहायता समूहों (SHG) और सामुदायिक संघों जैसे नेटवर्क के माध्यम से बनती है, सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण पूरक है। ये समूह ऋण, प्रशिक्षण और बाज़ार तक पहुंच को सुगम बनाकर आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देते हैं, जिससे उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलता है। उदाहरण के लिए, SHG ग्रामीण महिलाओं के लिए व्यवसाय शुरू करने और संपत्ति बनाने का एक शक्तिशाली माध्यम साबित हुए हैं।
सामाजिक रूप से, ये नेटवर्क परिवारों में महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाते हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, और प्रतिबंधात्मक पितृसत्तात्मक मानदंडों और लिंग-आधारित हिंसा को चुनौती देने के लिए एकजुटता का निर्माण करते हैं। राजनीतिक रूप से, यह सामूहिक शक्ति अक्सर स्थानीय शासन, जैसे पंचायतों में, अधिक भागीदारी में बदल जाती है। यहाँ, महिला नेता पेयजल और स्वच्छता जैसी सामुदायिक ज़रूरतों को प्राथमिकता देती हैं, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार, महिलाओं की सामूहिक आवाज़ को मजबूत करके, सामाजिक पूंजी लैंगिक समानता के लिए संरचनात्मक बाधाओं को दूर करती है।
07. E-governance projects have a built-in bias towards technology and back-end integration than user-centric designs. Examine. (Answer in 150 words) – 10
ई-गवर्नेंस परियोजनाओं का लक्ष्य शासन को कुशल और पारदर्शी बनाना है, लेकिन उनका डिज़ाइन अक्सर उपयोगकर्ता-केंद्रित होने के बजाय प्रौद्योगिकी और बैक-एंड एकीकरण पर अधिक केंद्रित होता है।
इन परियोजनाओं का मुख्य जोर केंद्रीकृत डेटाबेस और स्वचालित प्रणालियों के निर्माण पर है। उदाहरण के लिए, मनरेगा के लिए आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) और सरकारी खरीद के लिए गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसी पहलें प्रशासनिक दक्षता के लिए प्रक्रियाओं को एकीकृत करती हैं।
हालांकि, यह तकनीकी पूर्वाग्रह अंतिम-उपयोगकर्ता की जरूरतों की उपेक्षा करता है। डिजिटल डिवाइड और डिजिटल निरक्षरता, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, पहुंच में बड़ी बाधाएं पैदा करती हैं। कई प्लेटफॉर्म केवल अंग्रेजी और हिंदी में उपलब्ध हैं, जिससे भाषाई अल्पसंख्यक बाहर रह जाते हैं। मनरेगा में डिजिटल उपस्थिति (NMMS) जैसे तकनीकी उपकरणों का उपयोग बहिष्कार के हथियार के रूप में किया गया है, जिससे मजदूरी भुगतान में समस्याएं पैदा हुई हैं। ई-गवर्नेंस की सफलता के लिए, प्रौद्योगिकी-संचालित मॉडल से हटकर एक उपयोगकर्ता-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जो पहुंच और समावेशिता को प्राथमिकता दे।
08. Civil Society Organizations are often perceived as being anti-State actors than non-State actors. Do you agree? Justify. (Answer in 150 words) – 10
हाँ, नागरिक समाज संगठनों (CSOs) को तटस्थ 'गैर-राज्य' कर्ताओं के बजाय 'राज्य-विरोधी' कर्ताओं के रूप में देखने की धारणा बढ़ रही है। हालाँकि, यह दृष्टिकोण उनकी लोकतांत्रिक भूमिका का अति-सरलीकरण करता है।
CSOs को राज्य-विरोधी मानने की धारणा अक्सर सरकार की नीतियों पर उनकी प्रहरी (watchdog) की भूमिका से उत्पन्न होती है। जब CSO शासन की कमियों को उजागर करते हैं, मानवाधिकारों की वकालत करते हैं, या पर्यावरण उल्लंघन के खिलाफ अभियान चलाते हैं, तो उन्हें अक्सर "राष्ट्र-विरोधी" और विकास में बाधक करार दिया जाता है। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) जैसे नियामक तंत्रों का उपयोग करके सरकार द्वारा आलोचक संगठनों के लाइसेंस रद्द करना इस धारणा को पुष्ट करता है, और उन्हें "देश को नष्ट करने" की कोशिश कर रही विदेशी शक्तियों के एजेंट के रूप में प्रस्तुत करता है। विवादास्पद मुद्दों पर असंतोष और विरोध प्रदर्शन आयोजित करना इस दृष्टिकोण को और बढ़ावा देता है कि वे चुनी हुई सरकार के खिलाफ काम कर रहे हैं।
हालांकि, मौलिक रूप से CSO एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण गैर-राज्य कर्ता हैं। वे समाज कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में काम करके राज्य के प्रयासों के पूरक बनते हैं, और जागरूकता पैदा करते हैं। वे वंचितों को आवाज देकर और असहमति के लिए एक मंच प्रदान करके "सामाजिक सुरक्षा वाल्व" के रूप में कार्य करते हैं, जो राज्य को कमजोर करने के बजाय लोकतंत्र को मजबूत करता है। उनका विरोधात्मक रुख आम तौर पर विशिष्ट सरकारी नीतियों के खिलाफ होता है, न कि स्वयं राज्य के खिलाफ।
इस प्रकार, यह धारणा एक घटते नागरिक स्थान का परिणाम है, जहाँ राज्य को जवाबदेह ठहराने को अक्सर राज्य के विरुद्ध होना मान लिया जाता है।
09. India-Africa digital partnership is achieving mutual respect, co-development and long-term institutional partnerships. Elaborate. (Answer in 150 words) – 10
भारत-अफ्रीका डिजिटल साझेदारी वास्तव में पारस्परिक सम्मान, सह-विकास और दीर्घकालिक संस्थागत भागीदारी के सिद्धांतों पर आधारित एक मॉडल की ओर बढ़ रही है। यह पारंपरिक दाता-प्राप्तकर्ता संबंधों से हटकर एक सहयोगी दक्षिण-दक्षिण सहयोग ढांचे को दर्शाता है।
पारस्परिक सम्मान और सह-विकास: भारत का दृष्टिकोण अपने सफल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) जैसे UPI और आधार-आधारित सिस्टम (MOSIP) को एक वाणिज्यिक उत्पाद के बजाय डिजिटल सार्वजनिक संपत्ति के रूप में साझा करने पर आधारित है। यह मांग-संचालित मॉडल नामीबिया, घाना और टोगो जैसे अफ्रीकी देशों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्रौद्योगिकी को अपनाने और सह-विकसित करने की अनुमति देता है, जिससे आत्मनिर्भरता और आपसी सम्मान को बढ़ावा मिलता है। यह साझेदारी स्थानीय क्षमताओं के निर्माण और समान भागीदारी पर केंद्रित है, जिसकी अफ्रीका में सराहना की जाती है।
दीर्घकालिक संस्थागत भागीदारी: यह सहयोग प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से आगे बढ़कर स्थायी संस्थागत संबंध बना रहा है। पैन-अफ्रीकन ई-नेटवर्क प्रोजेक्ट (e-VBAB) टेली-शिक्षा और टेली-मेडिसिन के लिए भारतीय और अफ्रीकी विश्वविद्यालयों तथा अस्पतालों को जोड़कर ज्ञान साझाकरण को संस्थागत बनाता है। भारत-नामीबिया उत्कृष्टता केंद्र (आईटी) और अफ्रीकी संघ की स्थायी G-20 सदस्यता के लिए भारत की सफल वकालत जैसे कदम इस दीर्घकालिक दृष्टिकोण को और मजबूत करते हैं, जो अफ्रीका को वैश्विक शासन संरचनाओं में शामिल करते हुए एक साझा डिजिटल भविष्य के लिए एक स्थायी ढांचा तैयार करते हैं।
10. “With the waning of globalization, post-Cold War world is becoming a site of sovereign nationalism.” Elucidate. (Answer in 150 words) – 10
शीतयुद्ध के बाद का युग, जो कभी अति-वैश्वीकरण और एकध्रुवीय व्यवस्था द्वारा परिभाषित था, अब संप्रभु राष्ट्रवाद के प्रभुत्व वाले परिदृश्य में परिवर्तित हो रहा है। यह बदलाव वैश्वीकरण के पतन के कारण हो रहा है, जिसके कई कारक हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध और बढ़ते अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता जैसे भू-राजनीतिक संकटों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को खंडित कर दिया है, जिससे राष्ट्रों को पारस्परिक निर्भरता से पीछे हटने और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया है। वैश्वीकरण के पूर्व समर्थक अब आर्थिक राष्ट्रवाद और संरक्षणवादी नीतियों को अपना रहे हैं, जिससे नव-उदारवादी सहमति उलट गई है। इसके अलावा, वैश्वीकरण के लाभों के असमान वितरण ने दुनिया भर में लोकलुभावन और राष्ट्रवादी प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा दिया है।
संप्रभु राष्ट्रवाद का यह पुनरुत्थान 'राष्ट्रीय हितों', रणनीतिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आक्रामक खोज के रूप में प्रकट होता है। राष्ट्र तेजी से एकपक्षवाद, क्षेत्रीय गुटों का निर्माण और व्यापार के शस्त्रीकरण का सहारा ले रहे हैं, जिससे एक अधिक ध्रुवीकृत, बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ राष्ट्र-राज्य अपनी प्रधानता को फिर से स्थापित कर रहा है।
11. “Constitutional morality is the fulcrum which acts as an essential check upon the high functionaries and citizens alike…” In view of the above observation of the Supreme Court, explain the concept of constitutional morality and its application to ensure balance between judicial independence and judicial accountability in India. (Answer in 250 words) – 15
संवैधानिक नैतिकता का तात्पर्य संविधान में निहित मूल सिद्धांतों और मूल्यों के पालन से है, जो राज्य, उसके पदाधिकारियों और नागरिकों के कार्यों का मार्गदर्शन करते हैं। यह संवैधानिक ढांचे के प्रति सर्वोच्च सम्मान है, जो सत्ता में बैठे लोगों से आत्म-संयम और लोकप्रिय या बहुसंख्यक नैतिकता के ऊपर न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता की मांग करता है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, इसमें "संवैधानिक संस्कृति" पर आधारित "संविधान के नैतिक मूल्यों" को बनाए रखना शामिल है और यह संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों पर कर्तव्य डालता है।
न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही में संतुलन हेतु इसका अनुप्रयोग:
संवैधानिक नैतिकता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण दो स्तंभों- न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही- को संतुलित करने के लिए एक धुरी के रूप में कार्य करती है।
1. न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखना: न्यायिक स्वतंत्रता, जो संविधान की एक मूल विशेषता है, यह मांग करती है कि न्यायाधीश बिना किसी भय या पक्षपात के, कार्यपालिका या विधायिका के दबाव से मुक्त होकर कार्य करें। संवैधानिक नैतिकता शक्तियों के इस पृथक्करण को अनिवार्य करती है ताकि न्यायपालिका संविधान और मौलिक अधिकारों के अंतिम संरक्षक के रूप में कार्य कर सके। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को रद्द करने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय संवैधानिक नैतिकता का एक अनुप्रयोग था। न्यायालय ने तर्क दिया कि न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा होगी, जो एक गैर-समझौता योग्य संवैधानिक मूल्य है।
2. न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करना: जहाँ स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, वहीं संवैधानिक नैतिकता जवाबदेही की भी मांग करती है ताकि यह न्यायिक सर्वोच्चता न बन जाए। न्यायाधीश, संवैधानिक पदाधिकारियों के रूप में, संविधान और उसके मूल्यों को बनाए रखने की अपनी शपथ से बंधे हैं। उनका आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता में जनता के विश्वास की पुष्टि करने वाला होना चाहिए। न्यायाधीशों के खिलाफ आंतरिक जांच प्रक्रिया, 'न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्स्थापन' (1997), और बैंगलोर न्यायिक आचरण सिद्धांत (2002) जैसे तंत्र संवैधानिक नैतिकता में निहित जवाबदेही के उपकरण हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि न्यायाधीशों को कदाचार के लिए एक ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेह ठहराया जाए जो न्यायिक स्वतंत्रता का सम्मान करती हो और दंड से मुक्ति की अनुमति न देती हो।
इस प्रकार, संवैधानिक नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि स्वतंत्रता निरंकुश न हो और जवाबदेही कार्यपालिका के नियंत्रण का एक साधन न बने, जिससे न्यायपालिका की संस्थागत अखंडता और संतुलन बना रहे।
12. Indian Constitution has conferred the amending power on the ordinary legislative institutions with a few procedural hurdles. In view of this statement, examine the procedural and substantive limitations on the amending power of the Parliament to change the Constitution. (Answer in 250 words) – 15
भारतीय संविधान, एक जीवंत दस्तावेज़, अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संशोधन की शक्ति प्रदान करता है, जो लचीलेपन और कठोरता का एक अनूठा मिश्रण है। यह शक्ति पूर्ण नहीं है; यह विशिष्ट प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं और न्यायिक व्याख्या द्वारा विकसित सारभूत सीमाओं से घिरी हुई है।
प्रक्रियात्मक सीमाएँ: अनुच्छेद 368 में संशोधन के लिए तीन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं:
साधारण बहुमत द्वारा: अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर कुछ प्रावधानों को संसद के साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है, जैसे नए राज्यों का निर्माण।
विशेष बहुमत द्वारा: अधिकांश संवैधानिक प्रावधानों के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है—प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। यह मौलिक अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों पर लागू होता है।
विशेष बहुमत और राज्यों के अनुसमर्थन द्वारा: संघीय ढांचे को प्रभावित करने वाले संशोधनों, जैसे विधायी शक्तियों का वितरण, के लिए संसद में विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।
सारभूत सीमाएँ: सबसे महत्वपूर्ण सारभूत सीमा 'बुनियादी संरचना' का सिद्धांत है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित किया था।
यह सिद्धांत कहता है कि संसद की संशोधन शक्ति पूर्ण नहीं है; इसका उपयोग संविधान की 'बुनियादी संरचना' या आवश्यक विशेषताओं को बदलने या नष्ट करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
संविधान की एक 'रचना' होने के नाते, संसद इसकी 'स्वामी' नहीं बन सकती। कोई भी संशोधन जो इस मौलिक ढांचे को नुकसान पहुंचाता है, वह न्यायिक समीक्षा के अधीन है और उसे रद्द किया जा सकता है।
यद्यपि विस्तृत रूप से परिभाषित नहीं है, बुनियादी संरचना में संविधान की सर्वोच्चता, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक समीक्षा जैसे सिद्धांत शामिल हैं।
यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक संशोधन एक व्यापक सहमति को दर्शाते हैं और लोकतंत्र तथा न्याय के मूल आदर्शों को संरक्षित करते हैं, जिससे संविधान की सर्वोच्चता बनी रहती है।
13. Discuss the evolution of collegium system in India. Critically examine the advantages and disadvantages of the system of appointment of the Judges of the Supreme Court of India and that of the USA. (Answer in 250 words) – 15
भारत में कॉलेजियम प्रणाली, उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की एक अनूठी व्यवस्था है, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की एक श्रृंखला के माध्यम से विकसित हुई। इसने कार्यपालिका की प्रधानता से न्यायिक प्रधानता की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास: प्रारंभ में, अनुच्छेद 124 के तहत, नियुक्ति में अंतिम निर्णय कार्यपालिका का होता था, जैसा कि प्रथम न्यायाधीश मामले (1981) में पुष्टि की गई थी। हालाँकि, दूसरे (1993) और तीसरे (1998) न्यायाधीश मामलों ने "परामर्श" को "सहमति" के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया, जिससे कॉलेजियम की स्थापना हुई—जो भारत के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम न्यायाधीशों का एक निकाय है—जिसे न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्तियों में प्रधानता दी गई। इसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से बदलने के संसदीय प्रयास को, जिसमें कार्यपालिका को भी भूमिका दी गई थी, 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है, जो संविधान की एक मूल संरचना है।
नियुक्ति प्रणालियों का तुलनात्मक विश्लेषण:
भारत (कॉलेजियम प्रणाली):
लाभ: इसका मुख्य लाभ कार्यपालिका के हस्तक्षेप से न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा करना है, जो संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना जाता है। यह प्रणाली न्यायपालिका को नियंत्रित करने के कार्यकारी प्रयासों की प्रतिक्रिया के रूप में बनाई गई थी।
हानि: इस प्रणाली की अपारदर्शिता, पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के लिए व्यापक रूप से आलोचना की जाती है। भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आरोप भी आम हैं, और इसे "भाई-भतीजावाद का पर्याय" कहा गया है। इसके अलावा, कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी देने में कार्यपालिका की निष्क्रियता अक्सर महत्वपूर्ण देरी का कारण बनती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति):
लाभ: राष्ट्रपति सीनेट की पुष्टि के साथ न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं, जिससे निर्वाचित शाखाओं के माध्यम से लोकतांत्रिक जवाबदेही और नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली सुनिश्चित होती है। संघीय न्यायाधीश "अच्छे व्यवहार" के आधार पर आजीवन पद पर बने रहते हैं।
हानि: यह प्रक्रिया अत्यधिक राजनीतिकरण के प्रति संवेदनशील है, जिसमें नियुक्तियाँ अक्सर शुद्ध योग्यता के बजाय पक्षपातपूर्ण विचारधाराओं को दर्शाती हैं, जिससे विधायी गतिरोध की संभावना होती है।
संक्षेप में, भारत की प्रणाली पारदर्शिता की कीमत पर न्यायिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती है, जबकि अमेरिकी मॉडल राजनीतिकरण के जोखिम पर जवाबदेही को प्राथमिकता देता है, जो संवैधानिक शासन में एक मौलिक बहस को उजागर करता है।
14. Examine the evolving pattern of Centre-State financial relations in the context of planned development in India. How far have the recent reforms impacted the fiscal federalism in India? (Answer in 250 words) – 15
भारत में केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का स्वरूप योजनाबद्ध विकास के युग से लेकर हाल के राजकोषीय सुधारों के दौर तक महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुआ है, जो एक केंद्रीकृत संरचना से अधिक विवादास्पद संघीय ढाँचे की ओर बदलाव को दर्शाता है।
योजनाबद्ध विकास के दौरान विकास: योजनाबद्ध विकास का युग योजना आयोग के प्रभुत्व वाला था, जो एक अतिरिक्त-संवैधानिक निकाय था और योजना अनुदानों तथा केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) के माध्यम से राज्यों को वित्तीय हस्तांतरण का एक प्रमुख माध्यम बन गया था। इस मॉडल ने केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया, जिससे राज्य विकासात्मक निधियों के लिए केंद्र पर बहुत अधिक निर्भर हो गए। इसने एक महत्वपूर्ण ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन (VFI) पैदा किया, जहाँ राज्यों की व्यय जिम्मेदारियाँ, विशेष रूप से सामाजिक क्षेत्रों में, उनके राजस्व-उगाही शक्तियों से कहीं अधिक थीं, जो संघ के पास केंद्रित थीं।
हाल के सुधारों का प्रभाव: हाल के सुधारों ने राजकोषीय संघवाद को एक विरोधाभासी परिदृश्य में नया रूप दिया है:
बढ़ा हुआ हस्तांतरण लेकिन घटा हुआ पूल: योजना आयोग का उन्मूलन और 14वें तथा 15वें वित्त आयोगों की विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 41% तक बढ़ाने की सिफारिश को स्वीकार करना अधिक राजकोषीय स्वायत्तता की दिशा में कदम थे। हालाँकि, केंद्र की गैर-साझा करने योग्य उपकरों और अधिभारों पर बढ़ती निर्भरता ने इस विभाज्य पूल के आकार को कम कर दिया है, जिससे राज्यों को सकल कर राजस्व में उनका वैध हिस्सा प्रभावी रूप से नहीं मिल पा रहा है। उदाहरण के लिए, 2021-22 में सकल कर राजस्व में उनकी हिस्सेदारी 26.7% तक बढ़ गई, जो 2011-12 में 10.4% थी।
जीएसटी और घटी हुई राज्य स्वायत्तता: वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का कार्यान्वयन, 'एक राष्ट्र, एक बाजार' बनाते हुए, राज्यों के कई प्रमुख अप्रत्यक्ष करों को समाहित करके उनकी राजकोषीय स्वायत्तता को काफी हद तक कम कर दिया है। इसने केंद्रीय हस्तांतरण और जीएसटी मुआवजे पर उनकी निर्भरता को बढ़ा दिया है।
दबावकारी संघवाद का उदय: केंद्र प्रायोजित योजनाएं (CSS) राज्यों से मिलान निधि की आवश्यकता के द्वारा राज्य व्यय प्राथमिकताओं को निर्धारित करना जारी रखती हैं, अक्सर राज्य सूची के विषयों में। इसके अलावा, केंद्र ने अपने निर्देशों का पालन न करने पर धन रोकना शुरू कर दिया है, जिससे सहकारी संघवाद को कई राज्य दबावकारी संघवाद के रूप में देखते हैं।
संक्षेप में, जबकि सुधारों ने औपचारिक रूप से अधिक धन हस्तांतरित किया, राजकोषीय उपकरणों के माध्यम से केंद्र के व्यापक नियंत्रण ने इसे तीव्र कर दिया है, जिससे केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध अधिक जटिल और टकरावपूर्ण हो गए हैं।
15. What are environmental pressure groups? Discuss their role in raising awareness, influencing policies and advocating for environmental protection in India. (Answer in 250 words) – 15
पर्यावरण दबाव समूह गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी संगठन या नागरिक समाज आंदोलन होते हैं जिनका उद्देश्य स्वयं राजनीतिक सत्ता प्राप्त किए बिना पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनमत और सरकारी नीति को प्रभावित करना होता है। भारत में, ये समूह परिवर्तन के महत्वपूर्ण कारक के रूप में उभरे हैं।
उनकी भूमिका को तीन प्रमुख कार्यों के तहत समझा जा सकता है:
जागरूकता बढ़ाना: ये समूह प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं और पर्यावरणीय मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाते हैं। वे विरोध प्रदर्शनों का उपयोग करते हैं, जैसा कि COP27 जैसे वैश्विक मंचों पर देखा गया, और मीडिया तथा सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से वनों की कटाई, प्रदूषण और जैव विविधता के खतरों जैसी समस्याओं को उजागर करते हैं। उदाहरण के लिए, #DelhiTreeSoS जैसे नागरिक समाज के नेतृत्व वाले आंदोलन पेड़ काटने के खिलाफ मामला बनाने के लिए डेटा एकत्र और प्रसारित करते हैं, जबकि 'पीपल फॉर अरावली' जैसे समूह क्षेत्रीय पारिस्थितिक संकटों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए 'हरियाणा ग्रीन मैनिफेस्टो' बनाते हैं।
नीतियों को प्रभावित करना: दबाव समूह सरकारी परियोजनाओं और विनियमों की जांच करके नीतिगत वकालत में सक्रिय रूप से संलग्न होते हैं। अनुसंधान और लॉबिंग के माध्यम से, वे विनाशकारी विकास की धारणाओं को चुनौती देते हैं और पर्यावरण कानूनों में कमियों को उजागर करते हैं। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च जैसी संस्थाओं ने शहरी वृक्ष कानूनों की अपर्याप्तता और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी पर रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिससे नीतिगत सुधारों को बढ़ावा मिला है।
पर्यावरण संरक्षण की वकालत: इन समूहों का एक प्राथमिक उपकरण न्यायिक सक्रियता है। वे अक्सर जनहित याचिकाएं (PIL) दायर करते हैं, जिससे सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा ऐतिहासिक निर्णय दिए गए हैं, जिन्होंने भारत में पर्यावरण न्यायशास्त्र के दायरे का विस्तार किया है। इसके अतिरिक्त, वे जमीनी स्तर पर लामबंदी में उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं, और उन परियोजनाओं के खिलाफ समुदाय-आधारित विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और आजीविका के लिए खतरा हैं, जैसे कि एन्नोर क्रीक में अडानी बंदरगाह विस्तार के खिलाफ आंदोलन।
चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, ये समूह विकास को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करने और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अनिवार्य हैं।
16. Inequality in the ownership pattern of resources is one of the major causes of poverty. Discuss in the context of ‘paradox of poverty’. (Answer in 250 words) – 15
'गरीबी का विरोधाभास', जहाँ संसाधन-संपन्न क्षेत्रों में उच्च स्तर की गरीबी मौजूद है, भारत में एक कटु वास्तविकता है। यह विरोधाभास मूल रूप से संसाधनों के स्वामित्व पैटर्न में गहरी असमानता से प्रेरित है, जो कुछ हाथों में धन और अवसर को केंद्रित करके गरीबी को स्थायी बनाता है।
संसाधनों का असमान स्वामित्व गरीबी का एक प्रमुख कारण है। भारत में, यह असमानता ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर है, यहाँ तक कि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से भी अधिक। आँकड़े धन के अत्यधिक संकेंद्रण को दर्शाते हैं, जहाँ सबसे अमीर 10% लोग देश की कुल संपत्ति का 80.7% हिस्सा रखते हैं। यह असमानता किसी व्यक्ति के जीवनकाल का उत्पाद नहीं है, बल्कि यह एक अंतर-पीढ़ीगत विरासत है, जो जाति जैसी सामाजिक संरचनाओं द्वारा गहराई से प्रभावित है। जाति ने ऐतिहासिक रूप से भूमि, शिक्षा और पूंजी जैसे संसाधनों तक पहुँच को निर्धारित किया है, जिससे कुछ समूहों को सामूहिक नुकसान हुआ है।
यह प्रणालीगत असमानता गरीबी के विरोधाभास की व्याख्या करती है। भारत के सबसे गरीब क्षेत्र अक्सर सबसे अधिक संसाधन-संपन्न होते हैं, जैसे कि छत्तीसगढ़ और झारखंड के वन क्षेत्र। यद्यपि ये क्षेत्र धन उत्पन्न करते हैं, लेकिन लाभ उच्च-आय वाले शहरी समूहों की ओर झुका होता है, और स्थानीय समुदाय, जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं, इससे वंचित रह जाते हैं। यह बहिष्करण सदियों के भेदभाव में निहित है, यही कारण है कि गरीबों का बड़ा हिस्सा दलित, आदिवासी और बहुजन समुदायों से है।
यह एक बड़ी आबादी को 'अनिश्चित क्षेत्र' में फँसा देता है—जो गंभीर गरीबी से थोड़ा ऊपर तो आ जाते हैं, लेकिन बीमारी या बेरोजगारी जैसे आर्थिक झटकों का सामना करने के लिए उनके पास संपत्ति का अभाव होता है। इस प्रकार, गरीबी केवल आय की कमी नहीं है, बल्कि संसाधनों, क्षमताओं और विकल्पों का एक बहुआयामी अभाव है। इस चक्र को तोड़ने के लिए, नीति को केवल आय समर्थन से हटकर असमान धन वितरण के संरचनात्मक मुद्दे को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
17. “In contemporary development models, decision-making and problem-solving responsibilities are not located close to the source of information and execution defeating the objectives of development.” Critically evaluate. (Answer in 250 words) – 15
यह कथन कि समकालीन विकास मॉडल में निर्णय लेने और समस्या-समाधान की जिम्मेदारियाँ सूचना और कार्यान्वयन के स्रोत के पास स्थित नहीं होतीं, जिससे विकास के उद्देश्य विफल हो जाते हैं, प्रचलित शीर्ष-डाउन दृष्टिकोण की एक सटीक आलोचना है। यह केंद्रीकृत प्रतिमान अक्सर अक्षम परिणामों, पारिस्थितिक क्षति और स्थानीय समुदायों के हाशिए पर जाने का कारण बनता है, जो सतत और समावेशी विकास के लक्ष्यों को कमजोर करता है।
केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया और इसकी विफलताएँ: भारत में इस अलगाव के प्रमाण व्यापक हैं। लद्दाख में, स्थानीय रूप से निर्धारित विकास को सक्षम करने के उद्देश्य से एक स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (AHDC) के अस्तित्व के बावजूद, एक अध्ययन में पाया गया कि निर्णय लेने की प्रक्रिया मुख्य रूप से श्रीनगर और दिल्ली जैसे दूरस्थ केंद्रों द्वारा नियंत्रित थी। प्रशासन अक्सर लद्दाख के बाहर की परामर्श एजेंसियों को योजना बनाने का काम सौंपता है, जिससे स्थानीय विशेषज्ञता और आकांक्षाओं की अनदेखी होती है। इसी तरह, भारत में शहरी नियोजन की आलोचना इसके पुरातन "मास्टर प्लान" पर निर्भरता के लिए की जाती है, जो अक्सर बड़े सलाहकारों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और सामाजिक आवास जैसी स्थानीय जरूरतों को संबोधित किए बिना पूंजी-गहन समाधानों का पक्ष लेते हैं।
यह शीर्ष-डाउन मॉडल एक "तकनीकी अंतर" पैदा करता है, जहाँ शीर्ष नीति-निर्माता, विशिष्ट कौशल की कमी के कारण, महत्वपूर्ण कार्यों को आउटसोर्स करते हैं, और स्थानीय ज्ञान को दरकिनार कर देते हैं। कार्यान्वयन-संबंधी मुद्दों पर निर्णय लेने से अग्रिम पंक्ति के कर्मियों पर प्रतिबंध अविश्वास की संस्कृति को बढ़ावा देता है और जवाबदेही को कमजोर करता है।
इस अलगाव के परिणाम: सत्ता का जमीनी हकीकत से यह पृथक्करण सीधे तौर पर विकास के उद्देश्यों को विफल करता है। जोशीमठ का धँसना इसका एक स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ क्षेत्र की नाजुकता (सूचना का स्रोत) पर प्रकाश डालने वाली 1976 की एक रिपोर्ट को निर्णय-निर्माताओं द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, जिन्होंने बड़े पैमाने पर निर्माण को मंजूरी दी, जिससे एक अनुमानित आपदा हुई। कोच्चि के ब्रह्मपुरम जैसे केंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन समाधानों की विफलता, विकेंद्रीकृत, स्थानीय नेतृत्व वाली पहलों की सफलता के विपरीत है।
आगे का मार्ग: विकेंद्रीकरण और सशक्तीकरण: समाधान एक विकेंद्रीकृत, बॉटम-अप मॉडल की ओर बढ़ने में निहित है जो ग्राम सभाओं और अग्रिम पंक्ति के पदाधिकारियों से "स्थितिजन्य ज्ञान" को महत्व देता है। इसके लिए पंचायतों जैसे स्थानीय संस्थानों को कार्यों, निधियों और पदाधिकारियों के साथ सशक्त बनाने की आवश्यकता है, एक ऐसी प्रक्रिया जो राज्यों की शक्ति हस्तांतरित करने की अनिच्छा के कारण अधूरी बनी हुई है।
हालांकि, अकेले विकेंद्रीकरण कोई रामबाण नहीं है; इसे क्षमता निर्माण के साथ जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि स्थानीय सरकारों में धन और परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए पेशेवर विशेषज्ञता की कमी हो सकती है। वास्तविक विकास अग्रिम पंक्ति के पदाधिकारियों को वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों के प्रत्यायोजन और स्थानीय शासन का व्यवसायीकरण करने पर निर्भर करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि समस्या-समाधान ठीक वहीं स्थित हो जहाँ समस्याएँ—और समाधान—उत्पन्न होती हैं।
18. The National Commission for Protection of Child Rights has to address the challenges faced by children in the digital era. Examine the existing policies and suggest measures the Commission can initiate to tackle the issue. (Answer in 250 words) – 15
भूमिका: डिजिटल युग बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुआयामी चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, जिनमें साइबरबुलिंग, ऑनलाइन शोषण, डिजिटल लत और बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) का प्रसार शामिल है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), एक शीर्ष निकाय के रूप में, इन मुद्दों के समाधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मौजूदा नीतियां और कमियां: भारत में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 जैसे कई कानूनी ढांचे मौजूद हैं। नया डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के डेटा को संसाधित करने के लिए सत्यापन योग्य माता-पिता की सहमति को अनिवार्य करता है।
हालांकि, इन नीतियों में कमियां हैं। DPDP अधिनियम का माता-पिता की सहमति पर निर्भर रहना कम डिजिटल साक्षरता वाले देश में एक चुनौती है, जो प्लेटफार्मों से जिम्मेदारी हटाकर माता-पिता पर डालता है। मौजूदा कानून अक्सर प्रतिक्रियाशील होते हैं और एआई-जनित डीपफेक और ऑनलाइन बाल शोषण सामग्री जैसे उभरते खतरों से निपटने में संघर्ष करते हैं। इसके अतिरिक्त, "बच्चे के सर्वोत्तम हित" का सिद्धांत, जिसे भारत ने अन्य कानूनों में बरकरार रखा है, डेटा संरक्षण पर पर्याप्त रूप से लागू नहीं किया गया है।
NCPCR द्वारा उठाए जाने वाले कदम: आयोग निम्नलिखित उपाय शुरू कर सकता है:
नीतिगत हिमायत: NCPCR को आईटी अधिनियम और POCSO अधिनियम में संशोधन की वकालत करनी चाहिए ताकि एआई-जनित CSAM जैसे नए युग के खतरों से निपटा जा सके। इसे माता-पिता की सहमति मॉडल से जोखिम-आधारित दृष्टिकोण की ओर बढ़ने पर जोर देना चाहिए, जिसमें प्लेटफार्मों को नाबालिगों के लिए जोखिम मूल्यांकन करने और 'सेफ्टी-बाय-डिजाइन' सुविधाओं को शामिल करने के लिए अनिवार्य किया जाए, जैसा कि यूके के 'ऐज-एप्रोप्रियेट डिजाइन कोड' जैसे अंतरराष्ट्रीय मॉडलों में है।
नियामक दिशानिर्देश: आयोग ऑनलाइन प्लेटफार्मों, शैक्षणिक संस्थानों और अभिभावकों के लिए डिजिटल सुरक्षा, सामग्री मॉडरेशन और नैतिक ऑनलाइन व्यवहार पर बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी कर सकता है।
शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना: इसे अपने 'ई-बाल निदान' ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और POCSO ई-बॉक्स को विशेष रूप से ऑनलाइन शोषण के मामलों को कुशलतापूर्वक संभालने के लिए बढ़ाना चाहिए।
जागरूकता और निगरानी: बच्चों और अभिभावकों के लिए राष्ट्रव्यापी साइबर सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम शुरू करना और अनुपालन के लिए प्लेटफार्मों की निगरानी के लिए अपनी वैधानिक शक्तियों का उपयोग करना।
निष्कर्ष: NCPCR के नेतृत्व में एक सक्रिय, बहु-हितधारक दृष्टिकोण, जो प्लेटफॉर्म जवाबदेही, मजबूत कानूनी ढांचे और डिजिटल साक्षरता पर केंद्रित हो, भारत के बच्चों के लिए डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
19. “Energy security constitutes the dominant kingpin of India’s foreign policy, and is linked with India’s overarching influence in Middle Eastern countries.” How would you integrate energy security with India’s foreign policy trajectories in the coming years? (Answer in 250 words) – 15
ऊर्जा सुरक्षा भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार है, जिसका कारण इसकी उच्च आयात निर्भरता है। पश्चिम एशिया पारंपरिक रूप से एक प्रमुख हाइड्रोकार्बन आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन इसकी भू-राजनीतिक अस्थिरता एक दूरदर्शी और एकीकृत ऊर्जा रणनीति की मांग करती है। आने वाले वर्षों में, भारत की विदेश नीति ऊर्जा सुरक्षा को एक बहु-आयामी दृष्टिकोण के माध्यम से एकीकृत करेगी।
पहला है ऊर्जा के स्रोतों और प्रकारों का विविधीकरण। इसमें खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना शामिल है, जिसके लिए यूक्रेन संघर्ष के बाद शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता बन चुके रूस और अमेरिका (तेल, LNG और असैन्य परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए) के साथ ऊर्जा संबंधों को मजबूत किया जाएगा। भारत हाइड्रोकार्बन संसाधनों के लिए लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के साथ भी जुड़ाव बढ़ाएगा। विविध साझेदारियों की यह खोज एक बहुध्रुवीय दुनिया में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए मौलिक है।
दूसरा है वैश्विक हरित ऊर्जा संक्रमण का नेतृत्व करना। भारत की विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसे मंचों के माध्यम से अपनी सॉफ्ट पावर को प्रदर्शित करने और स्थायी साझेदारी बनाने के लिए निर्देशित होगी। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों के सहयोग से भारत को ग्रीन हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए कूटनीति का उपयोग किया जाएगा। इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों के लिए आवश्यक लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना क्वाड जैसे फ्रेमवर्क के माध्यम से एक मुख्य उद्देश्य होगा, जिससे चीन पर निर्भरता कम होगी।
तीसरा है ऊर्जा-केंद्रित कनेक्टिविटी का निर्माण। विदेश नीति भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC), जिसमें ऊर्जा पाइपलाइनों के प्रावधान शामिल हैं, और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय ऊर्जा ग्रिड जैसी परियोजनाओं को सक्रिय रूप से बढ़ावा देगी।
यह एकीकृत रणनीति भारत को एक निष्क्रिय ऊर्जा खरीदार से एक सक्रिय नेता में बदल देती है, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का उपयोग रणनीतिक साझेदारी बनाने, ग्लोबल साउथ के लिए सतत विकास का समर्थन करने और विकसित हो रही वैश्विक व्यवस्था में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत करने के लिए करती है।
20. “The reform process in the United Nations remains unresolved, because of the delicate imbalance of East and West and entanglement of the USA vs. Russo-Chinese alliance.” Examine and critically evaluate the East-West policy confrontations in this regard. (Answer in 250 words) – 15
संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधार प्रक्रिया, विशेष रूप से सुरक्षा परिषद (UNSC) से संबंधित, पूर्व और पश्चिम के बीच गहरे नीतिगत टकरावों के कारण अनसुलझी बनी हुई है। यह गतिरोध अमेरिका बनाम रूस-चीन गठबंधन के उलझाव से और भी जटिल हो गया है, जिसने संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों को काफी हद तक निष्क्रिय बना दिया है।
सुरक्षा परिषद का पक्षाघात: यह टकराव मुख्य रूप से सुरक्षा परिषद में देखा जाता है, जिसने इसे "पंगु" बना दिया है। स्थायी पाँच (P-5) सदस्य अपने या अपने सहयोगियों के रणनीतिक हितों के खिलाफ प्रस्तावों को रोकने के लिए लगातार अपनी वीटो शक्ति का उपयोग करते हैं। यूक्रेन संघर्ष इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ रूस ने महत्वपूर्ण प्रस्तावों को वीटो किया, जबकि पश्चिमी देशों ने जवाबी प्रयास किए, जिससे एक गतिरोध पैदा हो गया। इसी तरह, चीन भारत और अमेरिका द्वारा प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र के आतंकवादी पदनामों को बार-बार रोकता है, जो आतंकवाद-विरोधी तंत्रों के राजनीतिकरण को दर्शाता है।
व्यापक भू-राजनीतिक गतिरोध: यह टकराव संयुक्त राष्ट्र से परे अन्य बहुपक्षीय मंचों को भी पंगु बना रहा है। भारत की अध्यक्षता में G-20 की बैठकें यूक्रेन युद्ध से संबंधित भाषा पर रूस-चीन के गठजोड़ की आपत्तियों के कारण बार-बार संयुक्त विज्ञप्ति जारी करने में विफल रही हैं। यह एक कठोर "शीत युद्ध की मानसिकता" को दर्शाता है जो महत्वपूर्ण आर्थिक और सुरक्षा मुद्दों पर वैश्विक सहमति को रोकता है।
सुधार में संरचनात्मक बाधाएँ: सुधार प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से रुकी हुई है क्योंकि किसी भी बदलाव के लिए P-5 के बीच आम सहमति की आवश्यकता होती है, जो अपनी 1945 के बाद की शक्तियों को कम करने के बारे में "ऐतिहासिक रूप से उत्साही नहीं" हैं। यह समस्या संयुक्त राष्ट्र महासभा के विभाजन से और भी जटिल हो जाती है, जहाँ पाँच प्रतिस्पर्धी वार्ता समूह एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं, जिससे किसी भी सुधार प्रस्ताव के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का गठन नहीं हो पाता है।
निष्कर्ष: पूर्व-पश्चिम टकराव ने संयुक्त राष्ट्र के लिए एक विश्वसनीयता का संकट पैदा कर दिया है। यह गतिरोध केवल नीतिगत मतभेदों के बारे में नहीं है, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक चुनौती है, जो स्थापित पश्चिम को संशोधनवादी रूस-चीन गुट के खिलाफ खड़ा करती है। यह अनसुलझा गतिरोध संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक बनाने का जोखिम उठाता है, और G-20 जैसे अधिक प्रतिनिधि मंचों के लिए जगह बना सकता है।